परिचय
नमस्ते दोस्तों! मैं पंकज, देवभूमि उत्तराखंड से, आपके अपने ब्लॉग ‘ई-उपचार’ पर एक बार फिर हाज़िर हूँ। आजकल की भागदौड़ भरी ज़िंदगी में, जहाँ एक तरफ़ हम रोज़ नई तकनीक अपना रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ़, अपने स्वास्थ्य और शांति के लिए हम एक बहुत पुरानी, पर उतनी ही कारगर राह की ओर मुड़ रहे हैं – आयुर्वेद और योग। आप में से बहुत से लोग सोच रहे होंगे कि एक कंप्यूटर साइंस का छात्र, जो कोड और लॉजिक में उलझा रहता था, वो आज जड़ी-बूटियों और प्राकृतिक जीवनशैली की बात क्यों कर रहा है? यही तो खूबसूरती है दोस्तों! मेरा मानना है कि विज्ञान और प्राचीन ज्ञान, दोनों का अपना महत्व है, और जब ये साथ आते हैं, तो ज़िंदगी को समझने का एक नया नज़रिया मिलता है।
मैं उत्तराखंड के पहाड़ों में पला-बढ़ा हूँ, जहाँ प्रकृति के साथ जीना एक जीवनशैली है, न कि कोई विकल्प। सुबह की ताज़ी हवा, नदियों का कल-कल करता पानी, जंगलों में जड़ी-बूटियों की महक और दिन भर की शारीरिक मेहनत – ये सब हमारे जीवन का अभिन्न हिस्सा रहे हैं। वहीं, जब मैं पढ़ाई के लिए शहर आया, तो देखा कि यहाँ ज़िंदगी एक अलग ही रफ़्तार से चल रही है। सुबह की शुरुआत चाय-कॉफ़ी से होती है, दिन भर स्क्रीन के सामने घंटों बिताना, और शाम को थकान मिटाने के लिए फ़ास्ट फ़ूड या दवाइयों का सहारा लेना आम बात है। मैंने महसूस किया कि इस तेज़-रफ्तार जीवन में हम अपनी जड़ों से, अपनी प्रकृति से दूर होते जा रहे हैं, और इसका सीधा असर हमारे स्वास्थ्य पर पड़ रहा है।
कंप्यूटर साइंस में मेरा बैकग्राउंड मुझे हर चीज़ को तर्क और विश्लेषण की कसौटी पर कसना सिखाता है। इसीलिए, जब मैं आयुर्वेद की ओर मुड़ा, तो मैंने इसे सिर्फ़ एक पारंपरिक पद्धति के रूप में नहीं देखा, बल्कि इसके पीछे के वैज्ञानिक पहलुओं, इसके तर्कों और हज़ारों सालों के अनुभव को समझने की कोशिश की। मैंने देखा कि आयुर्वेद सिर्फ़ बीमारियों का इलाज नहीं करता, बल्कि हमें एक संपूर्ण और संतुलित जीवन जीने का तरीका सिखाता है। यह हमें प्रकृति से जोड़ता है, हमारे शरीर को भीतर से मज़बूत करता है और हमें दवाइयों पर पूरी तरह निर्भर रहने की बजाय, खुद को ठीक करने की शक्ति देता है। मेरा लक्ष्य यही है कि मैं अपने इस ब्लॉग के ज़रिए आप तक आयुर्वेद और योग के इन्हीं सिद्धांतों को सरल, तार्किक और भरोसेमंद तरीके से पहुँचा सकूँ, ताकि आप भी अपनी ज़िंदगी में संतुलन और स्वास्थ्य को पा सकें। आज हम एक ऐसी ही बेहतरीन आयुर्वेदिक जड़ी-बूटी ‘अडूसा’ या ‘Adusa’ के बारे में बात करेंगे, जो सदियों से हमारे पारंपरिक चिकित्सा का हिस्सा रही है।
Adusa क्या है और आयुर्वेद में इसका स्थान
अडूसा, जिसे वैज्ञानिक रूप से Adhatoda vasica या Justicia adhatoda के नाम से जाना जाता है, एक बहुत ही महत्वपूर्ण आयुर्वेदिक जड़ी-बूटी है। यह भारत के कई हिस्सों में, खासकर उप-हिमालयी क्षेत्रों में और मेरे उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्यों में आसानी से पाया जाने वाला पौधा है। आपने इसे शायद अपने आस-पास भी देखा होगा – इसकी पत्तियाँ लंबी और हरी होती हैं, और इस पर सफ़ेद फूल आते हैं। आयुर्वेद में इसे ‘वासका’ या ‘सिंहपर्णी’ जैसे नामों से भी जाना जाता है।
आयुर्वेदिक ग्रंथों में अडूसा का ज़िक्र हज़ारों सालों से मिलता आ रहा है। यह मुख्य रूप से श्वसन संबंधी समस्याओं के लिए एक अचूक औषधि के रूप में विख्यात है। चरक संहिता, सुश्रुत संहिता और अष्टांग हृदयम जैसे प्रमुख आयुर्वेदिक ग्रंथों में इसके औषधीय गुणों का विस्तार से वर्णन किया गया है। आयुर्वेद में अडूसा को कफ और पित्त दोष को शांत करने वाला माना जाता है। इसका स्वाद कड़वा और कसैला होता है और इसकी तासीर ठंडी होती है। यह अपने इन्हीं गुणों के कारण शरीर में जमे कफ को पिघलाकर बाहर निकालने में मदद करता है और श्वसन मार्गों को साफ रखता है।
अडूसा का उपयोग सिर्फ़ पत्तों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके फूल, जड़ और तने का भी अलग-अलग औषधीय प्रयोजनों के लिए इस्तेमाल किया जाता है। इसकी पारंपरिक उपयोगिता को देखते हुए, यह आज भी कई आयुर्वेदिक, यूनानी और होम्योपैथिक दवाओं का एक मुख्य घटक है। इसकी पहचान आयुर्वेद में एक ऐसी जड़ी-बूटी के रूप में है जो न सिर्फ़ लक्षणों से राहत देती है, बल्कि बीमारी के मूल कारण पर काम करती है, विशेषकर जब बात श्वसन तंत्र से जुड़ी समस्याओं की हो। मेरा मानना है कि प्रकृति ने हमें अपने स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिए अनमोल उपहार दिए हैं, और अडूसा उन्हीं में से एक है।
Adusa में मौजूद मुख्य जड़ी-बूटियाँ और उनके गुण
जब हम ‘अडूसा’ नाम से किसी आयुर्वेदिक उत्पाद की बात करते हैं, तो अक्सर इसका मतलब होता है कि उसमें मुख्य घटक अडूसा (Adhatoda vasica) ही है। यह अपने आप में एक संपूर्ण औषधि है, और इसके औषधीय गुण इसके पत्तों और अन्य भागों में मौजूद कुछ खास रासायनिक यौगिकों के कारण होते हैं। हालांकि, कई बार अडूसा को अन्य जड़ी-बूटियों के साथ मिलाकर भी तैयार किया जाता है, ताकि उसके प्रभाव को और बढ़ाया जा सके या किसी विशिष्ट स्वास्थ्य समस्या को लक्ष्य किया जा सके। लेकिन, आज हम सिर्फ़ मुख्य अडूसा पौधे के गुणों पर ध्यान केंद्रित करेंगे, क्योंकि यह अपने आप में ही गुणों का खजाना है।
अडूसा में कई बायोएक्टिव यौगिक पाए जाते हैं, जिनमें वासिसीन (Vasicine), वासिसीनोन (Vasicinone), अधतोडिक एसिड (Adhatodic acid) और ब्रोंकिदीन (Bronchicine) प्रमुख हैं। ये अल्कलॉइड्स और अन्य यौगिक अडूसा को उसके अनोखे औषधीय गुण प्रदान करते हैं।
आइये, इनके सामान्य गुणों को थोड़ा और समझते हैं:
1. श्वसन संबंधी लाभ: यह अडूसा का सबसे प्रमुख गुण है। इसमें मौजूद वासिसीन और वासिसीनोन जैसे यौगिकों में ब्रोंकोडायलेटर (bronchodilator) और एक्सपेक्टोरेंट (expectorant) गुण होते हैं। सरल भाषा में कहें तो, ब्रोंकोडायलेटर गुण श्वसन मार्गों की मांसपेशियों को आराम देकर उन्हें चौड़ा करने में मदद करते हैं, जिससे सांस लेना आसान हो जाता है। एक्सपेक्टोरेंट गुण फेफड़ों और श्वसन नली में जमे बलगम या कफ को पतला करके उसे बाहर निकालने में सहायक होते हैं। इसीलिए यह खांसी, जुकाम, अस्थमा, ब्रोंकाइटिस और अन्य श्वसन संबंधी विकारों में पारंपरिक रूप से उपयोग होता रहा है।
2. एंटी-इंफ्लेमेटरी (सूजन-रोधी) गुण: अडूसा में ऐसे यौगिक होते हैं जो शरीर में सूजन को कम करने में मदद कर सकते हैं। यह गुण इसे गले की खराश, टॉन्सिलाइटिस और श्वसन मार्ग की सूजन जैसी स्थितियों में राहत प्रदान करने में उपयोगी बनाता है।
3. एंटीबैक्टीरियल और एंटीवायरल गुण: कुछ अध्ययनों और पारंपरिक उपयोगों से पता चलता है कि अडूसा में कुछ हद तक जीवाणुरोधी और एंटीवायरल गुण भी हो सकते हैं। यह इसे संक्रमण से लड़ने में सहायक बनाता है, खासकर श्वसन पथ के संक्रमणों में।
4. रक्त शुद्ध करने वाला (रक्तशोधक): आयुर्वेद में अडूसा को रक्त को शुद्ध करने वाला भी माना जाता है। यह शरीर से विषाक्त पदार्थों को निकालने और त्वचा संबंधी समस्याओं को सुधारने में भी पारंपरिक रूप से इस्तेमाल किया जाता है।
5. बुखार कम करने वाला (एंटीपायरेटिक): पारंपरिक रूप से, अडूसा का उपयोग बुखार को कम करने के लिए भी किया जाता रहा है, खासकर जब यह खांसी और जुकाम से जुड़ा हो।
यह ध्यान रखना ज़रूरी है कि ये सभी गुण पारंपरिक अनुभवों और कुछ वैज्ञानिक अध्ययनों पर आधारित हैं। मैं हमेशा कहता हूँ कि आयुर्वेद सिर्फ़ लक्षणों का इलाज नहीं करता, बल्कि शरीर के समग्र संतुलन पर काम करता है। अडूसा का भी यही सिद्धांत है – यह श्वसन प्रणाली को मज़बूत करके, शरीर को खुद ही ठीक होने में मदद करता है।
Adusa के संभावित फायदे
जैसा कि मैंने पहले बताया, अडूसा एक बेहद गुणकारी जड़ी-बूटी है और आयुर्वेद में इसके कई संभावित फ़ायदे बताए गए हैं। ये फ़ायदे सदियों के पारंपरिक अनुभवों और अवलोकन पर आधारित हैं, और मैं यहाँ किसी चमत्कारिक या तुरंत असर के दावे नहीं करूँगा, बल्कि एक संतुलित और यथार्थवादी दृष्टिकोण प्रस्तुत करूँगा।
अडूसा के कुछ प्रमुख संभावित फ़ायदे इस प्रकार हैं:
1. श्वसन संबंधी समस्याओं में राहत: यह अडूसा का सबसे प्रसिद्ध और स्थापित लाभ है।
* खांसी और जुकाम: यह कफ को पतला करके उसे बाहर निकालने में मदद करता है, जिससे खांसी में आराम मिलता है। इसकी पत्तियां गले की खराश और ज़ुकाम के लक्षणों को कम करने में भी सहायक मानी जाती हैं। * अस्थमा और ब्रोंकाइटिस: अडूसा श्वसन मार्गों को खोलने और सांस लेने में आसानी प्रदान करने में मदद कर सकता है। यह अस्थमा के दौरे की गंभीरता और आवृत्ति को कम करने में सहायक हो सकता है, लेकिन यह किसी भी तरह से इन्हेलर या आधुनिक दवाओं का विकल्प नहीं है। यह सिर्फ़ एक सहायक उपचार के रूप में काम करता है। * फेफड़ों को साफ रखना: यह फेफड़ों से बलगम और टॉक्सिन्स को हटाने में मदद करके फेफड़ों के स्वास्थ्य को बढ़ावा दे सकता है।
2. एंटी-इंफ्लेमेटरी प्रभाव: शरीर में कहीं भी होने वाली सूजन को कम करने में अडूसा सहायक हो सकता है। यह विशेष रूप से श्वसन मार्गों की सूजन को शांत करने में प्रभावी माना जाता है।
3. रक्त शोधन: आयुर्वेद में इसे रक्त शोधक (blood purifier) के रूप में भी जाना जाता है। यह शरीर से विषाक्त पदार्थों को बाहर निकालने में मदद करता है, जिससे त्वचा का स्वास्थ्य बेहतर हो सकता है और सामान्य स्वास्थ्य में सुधार हो सकता है।
4. बुखार में सहायक: पारंपरिक रूप से, अडूसा का उपयोग बुखार के लक्षणों को कम करने के लिए भी किया जाता रहा है, खासकर जब यह श्वसन संक्रमणों से जुड़ा हो।
5. अल्सर और घावों में: कुछ पारंपरिक उपयोगों में अडूसा का बाहरी या आंतरिक रूप से उपयोग अल्सर और घावों को ठीक करने में भी बताया गया है, हालांकि इस पर और शोध की आवश्यकता है।
6. पेट की समस्याओं में: अडूसा को कुछ हद तक पेट के कीड़ों और दस्त जैसी समस्याओं में भी सहायक माना जाता है, हालांकि इसका मुख्य उपयोग श्वसन संबंधी समस्याओं के लिए ही है।
यह समझना महत्वपूर्ण है कि आयुर्वेदिक उपचारों का प्रभाव व्यक्ति की प्रकृति (प्रकृति), बीमारी की गंभीरता और जीवनशैली पर निर्भर करता है। एक ही जड़ी-बूटी हर व्यक्ति पर समान रूप से असर करे, यह ज़रूरी नहीं है। इसलिए, किसी भी गंभीर स्वास्थ्य समस्या के लिए हमेशा एक योग्य आयुर्वेदिक चिकित्सक से सलाह लेना सबसे अच्छा होता है। अडूसा हमें प्रकृति से मिला एक ऐसा उपहार है, जो हमारे शरीर को भीतर से सशक्त बनाने में मदद करता है, ताकि वह खुद को रोगों से बचा सके।
Adusa का उपयोग कैसे करें
अडूसा का उपयोग कई रूपों में किया जा सकता है, और इसके सेवन का तरीका आपकी समस्या की गंभीरता, आपकी उम्र और आयुर्वेदिक चिकित्सक की सलाह पर निर्भर करता है। यहाँ मैं कुछ सामान्य तरीके बता रहा हूँ, लेकिन याद रखें, हर व्यक्ति की स्थिति अलग होती है, और इसीलिए व्यक्तिगत सलाह हमेशा बेहतर होती है।
अडूसा के सामान्य रूप:
1. अडूसा का रस (ताज़ा पत्तियों का): यह सबसे प्राकृतिक और प्रभावी तरीकों में से एक है। ताज़ी अडूसा की पत्तियों को पीसकर उसका रस निकाला जाता है।
* मात्रा: आमतौर पर, 5-10 मिलीलीटर (लगभग एक से दो चम्मच) रस दिन में दो बार लिया जा सकता है। * सेवन का समय: इसे सुबह खाली पेट या भोजन के बाद लिया जा सकता है, विशेषकर जब श्वसन संबंधी समस्याओं में तुरंत राहत चाहिए हो। इसे शहद के साथ मिलाकर लेने से इसका कड़वा स्वाद कुछ हद तक कम हो जाता है और शहद भी कफ को निकालने में मदद करता है।
2. अडूसा पाउडर (चूर्ण): सूखे अडूसा के पत्तों को पीसकर पाउडर बनाया जाता है।
* मात्रा: आधा से एक चम्मच (लगभग 1-3 ग्राम) पाउडर दिन में दो बार। * सेवन का समय: इसे गुनगुने पानी या शहद के साथ भोजन के बाद लिया जा सकता है।
3. अडूसा का काढ़ा (क्वाथ): यह अडूसा के सूखे पत्तों या अन्य भागों को पानी में उबालकर बनाया जाता है, जब तक कि पानी आधा न रह जाए।
* मात्रा: 20-50 मिलीलीटर काढ़ा दिन में दो बार। * सेवन का समय: इसे सुबह और शाम भोजन से पहले या बाद में लिया जा सकता है। खांसी और जुकाम में यह बहुत प्रभावी माना जाता है।
4. अडूसा सिरप या टैबलेट: बाज़ार में कई आयुर्वेदिक कंपनियाँ अडूसा के सिरप या टैबलेट बनाती हैं।
* मात्रा और सेवन का समय: इनके पैकेट पर दिए गए निर्देशों का पालन करें या अपने चिकित्सक की सलाह लें। ये अक्सर निश्चित खुराक और आसानी के लिए पसंद किए जाते हैं।
कुछ महत्वपूर्ण बातें:
* चिकित्सक की सलाह: मेरा सबसे पहला और महत्वपूर्ण सुझाव यह है कि अडूसा का उपयोग किसी भी बीमारी के इलाज के लिए करने से पहले एक योग्य आयुर्वेदिक चिकित्सक से सलाह ज़रूर लें। वे आपकी प्रकृति, दोष असंतुलन और बीमारी की गंभीरता के आधार पर सही खुराक और सेवन का तरीका बता सकते हैं। * निरंतरता: आयुर्वेदिक उपचारों का असर धीरे-धीरे होता है, इसलिए धैर्य और निरंतरता महत्वपूर्ण है। * बच्चों के लिए: बच्चों को अडूसा देने से पहले हमेशा बाल रोग विशेषज्ञ या आयुर्वेदिक चिकित्सक से सलाह लें। * अन्य दवाओं के साथ: यदि आप पहले से कोई अन्य दवा ले रहे हैं, तो अडूसा के उपयोग से पहले अपने डॉक्टर को ज़रूर बताएं, ताकि किसी भी तरह के इंटरेक्शन से बचा जा सके।
याद रखें, आयुर्वेद में उपचार सिर्फ़ जड़ी-बूटी लेने तक सीमित नहीं होता, बल्कि इसमें आहार, जीवनशैली और योग का भी उतना ही महत्व होता है। अडूसा एक शक्तिशाली औषधि है, और इसका सही उपयोग ही आपको अधिकतम लाभ दे सकता है।
सावधानियां और ध्यान रखने योग्य बातें
किसी भी औषधि का उपयोग करते समय सावधानी बरतना और कुछ बातों का ध्यान रखना बेहद ज़रूरी होता है, और अडूसा भी इसका अपवाद नहीं है। भले ही यह एक प्राकृतिक जड़ी-बूटी है, लेकिन इसका गलत या अत्यधिक उपयोग कुछ लोगों के लिए हानिकारक हो सकता है। मेरा तर्क-आधारित दृष्टिकोण हमेशा यही कहता है कि “प्राकृतिक” का मतलब हमेशा “सुरक्षित” नहीं होता, खासकर जब बात दवाओं की हो।
यहाँ कुछ महत्वपूर्ण सावधानियां और ध्यान रखने योग्य बातें दी गई हैं:
1. गर्भावस्था और स्तनपान:
* गर्भवती महिलाएं: अडूसा को आमतौर पर गर्भवती महिलाओं के लिए सुरक्षित नहीं माना जाता है। कुछ अध्ययनों से पता चला है कि यह गर्भाशय संकुचन को प्रेरित कर सकता है, जिससे गर्भपात का जोखिम बढ़ सकता है। इसलिए, गर्भावस्था के दौरान अडूसा का सेवन बिल्कुल न करें। * स्तनपान कराने वाली महिलाएं: स्तनपान कराने वाली महिलाओं को भी अडूसा के सेवन से बचना चाहिए, क्योंकि इसके प्रभाव शिशु पर पड़ सकते हैं। इस संबंध में पर्याप्त जानकारी उपलब्ध नहीं है, इसलिए सावधानी बरतना ही बेहतर है।
2. बच्चों और बुजुर्गों के लिए:
* बच्चों को अडूसा देने से पहले हमेशा एक योग्य बाल रोग विशेषज्ञ या आयुर्वेदिक चिकित्सक से सलाह लें। उनकी खुराक बहुत कम और नियंत्रित होनी चाहिए। * बुजुर्गों को भी कोई भी नई जड़ी-बूटी शुरू करने से पहले चिकित्सक से सलाह लेनी चाहिए, क्योंकि उनकी शारीरिक स्थिति और अन्य दवाएं अडूसा के साथ प्रतिक्रिया कर सकती हैं।
3. अन्य दवाओं के साथ उपयोग (ड्रग इंटरेक्शन):
* रक्त पतला करने वाली दवाएं (Blood Thinners): अडूसा में रक्त को पतला करने वाले गुण हो सकते हैं। यदि आप पहले से वार्फ़रिन (warfarin) या एस्पिरिन (aspirin) जैसी रक्त पतला करने वाली दवाएं ले रहे हैं, तो अडूसा का सेवन करने से रक्तस्राव का जोखिम बढ़ सकता है। इसे लेने से पहले अपने डॉक्टर से ज़रूर बात करें। * रक्तचाप की दवाएं: कुछ अध्ययनों में अडूसा को रक्तचाप पर प्रभाव डालते हुए देखा गया है। यदि आप उच्च रक्तचाप के लिए दवाएं ले रहे हैं, तो अडूसा का उपयोग सावधानी से करें और अपने रक्तचाप की नियमित निगरानी करें। * डायबिटीज की दवाएं: अडूसा रक्त शर्करा के स्तर को प्रभावित कर सकता है। यदि आप मधुमेह रोगी हैं और दवाएं ले रहे हैं, तो अडूसा का सेवन करने से पहले अपने डॉक्टर से सलाह लें, क्योंकि यह आपके रक्त शर्करा के स्तर को बहुत कम कर सकता है।
4. एलर्जी और संवेदनशीलता:
* यदि आपको अडूसा या इसके किसी भी घटक से एलर्जी है, तो इसका सेवन न करें। एलर्जी के लक्षणों में त्वचा पर चकत्ते, खुजली या सांस लेने में कठिनाई शामिल हो सकती है।
5. सर्जरी से पहले:
* चूंकि अडूसा रक्त को पतला कर सकता है, इसलिए किसी भी सर्जरी से कम से कम दो सप्ताह पहले इसका सेवन बंद कर देना चाहिए ताकि सर्जरी के दौरान या बाद में रक्तस्राव के जोखिम को कम किया जा सके।
6. सही खुराक का पालन करें:
* हमेशा बताई गई खुराक का ही सेवन करें। अधिक मात्रा में सेवन करने से मतली, उल्टी, दस्त या अन्य प्रतिकूल प्रभाव हो सकते हैं।
7. व्यक्तिगत स्थिति:
* प्रत्येक व्यक्ति की शारीरिक बनावट और स्वास्थ्य की स्थिति अलग होती है। जो एक व्यक्ति के लिए फ़ायदेमंद हो सकता है, वह दूसरे के लिए नहीं भी हो सकता। इसलिए, स्व-चिकित्सा से बचें और हमेशा पेशेवर सलाह लें।
संक्षेप में, अडूसा एक शक्तिशाली और प्रभावी जड़ी-बूटी है, लेकिन इसका उपयोग जिम्मेदारी के साथ और एक योग्य चिकित्सक की देखरेख में ही करना चाहिए। आयुर्वेद हमें प्रकृति से जुड़ने का मौका देता है, लेकिन इस जुड़ाव में समझदारी और सावधानी बेहद ज़रूरी है।
अच्छी गुणवत्ता वाले Adusa की पहचान
आजकल बाज़ार में आयुर्वेदिक उत्पादों की भरमार है, और ऐसे में असली और अच्छी गुणवत्ता वाले अडूसा उत्पाद की पहचान करना थोड़ा मुश्किल हो सकता है। मेरे कंप्यूटर साइंस बैकग्राउंड ने मुझे यह सिखाया है कि किसी भी सिस्टम में इनपुट की गुणवत्ता ही आउटपुट की गुणवत्ता तय करती है। ठीक वैसे ही, एक अच्छी जड़ी-बूटी ही अच्छे परिणाम देगी। यहाँ कुछ बातें हैं जिनसे आप अच्छी गुणवत्ता वाले अडूसा उत्पाद को पहचान सकते हैं:
1. स्रोत और ब्रांड की विश्वसनीयता:
* प्रसिद्ध और भरोसेमंद ब्रांड्स: Baidyanath, Dabur, Himalaya, Zandu, Patanjali जैसी कंपनियाँ दशकों से आयुर्वेदिक उत्पादों का निर्माण कर रही हैं और इनकी बाज़ार में एक अच्छी साख है। ये कंपनियाँ आमतौर पर गुणवत्ता नियंत्रण के कड़े मानकों का पालन करती हैं। हालाँकि, सिर्फ़ ब्रांड का नाम ही काफ़ी नहीं है, आपको उनके specific Adusa product की जानकारी भी देखनी चाहिए। मैं किसी एक ब्रांड का पक्ष नहीं