परिचय
नमस्ते दोस्तों! मैं पंकज, उत्तराखंड की देवभूमि से, आपके अपने इस ब्लॉग पर दिल से स्वागत करता हूँ। जैसा कि आप जानते हैं, मैं एक ऐसा इंसान हूँ जो पहाड़ों की सादगी और प्रकृति की गोद में पला-बढ़ा है। मेरा बचपन हरे-भरे जंगलों, साफ नदियों और शुद्ध हवा के बीच बीता है, जहाँ हर घर में दादी-नानी के नुस्खे और जड़ी-बूटियों का ज्ञान एक आम बात थी। मुझे याद है, छोटी-मोटी चोट लगने पर या पेट दर्द होने पर, तुरंत कोई न कोई पत्ती या काढ़ा मिल जाता था, और केमिकल वाली दवाइयों का नामो-निशान भी नहीं होता था।
हालांकि, मेरी पढ़ाई कंप्यूटर साइंस में हुई है। नंबरों, लॉजिक और एल्गोरिदम के बीच मेरी दुनिया चलती थी। लेकिन, इस टेक्निकल दुनिया में रहते हुए भी, मेरे मन में हमेशा अपनी जड़ों और उस प्राकृतिक जीवनशैली के प्रति एक गहरा लगाव रहा है। मैंने देखा है कि कैसे आज की तेज़-रफ़्तार शहरी ज़िंदगी में हम अपनी सेहत को नज़रअंदाज़ करते जा रहे हैं। भागदौड़, तनाव, प्रदूषण और केमिकल से भरे खाने ने हमारे शरीर और मन को थका दिया है। छोटी सी भी बीमारी होने पर हम तुरंत केमिकल वाली दवाइयों की तरफ भागते हैं, जिनके साइड इफेक्ट्स अक्सर बीमारी से ज़्यादा खतरनाक साबित होते हैं।
यही वह मोड़ था जब मुझे एहसास हुआ कि मुझे अपने तकनीकी ज्ञान और अपनी पहाड़ी विरासत को एक साथ लाना चाहिए। मेरा कंप्यूटर साइंस का बैकग्राउंड मुझे हर जानकारी को तर्क और सामान्य अनुभव के आधार पर समझने और समझाने में मदद करता है। मैं किसी भी बात को तब तक नहीं मानता, जब तक उसके पीछे कोई ठोस वजह या पारंपरिक ज्ञान का आधार न हो। इसी सोच के साथ मैंने यह ब्लॉग शुरू किया, ताकि मैं आप सभी तक आयुर्वेद, योग और प्राकृतिक जीवनशैली की उन अनमोल जानकारियों को पहुँचा सकूँ, जो हमारी सदियों पुरानी विरासत हैं। मेरा मक़सद सिर्फ इतना है कि आप जागरूक बनें, समझदारी से चुनें और केमिकल दवाओं पर पूरी तरह से निर्भर न रहें। आइए, मिलकर प्रकृति की ओर एक कदम बढ़ाएं!
Datura क्या है और आयुर्वेद में इसका स्थान
आज हम जिस विषय पर बात करने वाले हैं, वह आयुर्वेद की दुनिया में काफी विशिष्ट और शक्तिशाली माना जाता है – धतूरा। जब मैं ‘धतूरा’ कहता हूँ, तो आपके मन में शायद तुरंत वह पौधा आता होगा जिसके फल और फूल अक्सर मंदिरों में भगवान शिव को चढ़ाए जाते हैं। यह सही है, धतूरा वही पौधा है जिसे संस्कृत में ‘उन्मत्त’ या ‘शिवप्रिय’ भी कहा जाता है। लेकिन, आयुर्वेद में इसका उपयोग उतना सीधा और सरल नहीं है जितना इसे मंदिर में चढ़ाना।
धतूरा एक बेहद शक्तिशाली और तीक्ष्ण (तीव्र) औषधि मानी जाती है, जिसे आयुर्वेद में ‘विष द्रव्य’ यानी विषैले पदार्थों की श्रेणी में रखा गया है। इसका मतलब यह नहीं है कि इसे सीधे तौर पर या बिना किसी प्रक्रिया के इस्तेमाल किया जा सकता है। आयुर्वेद के प्राचीन ग्रंथों जैसे ‘चरक संहिता’, ‘सुश्रुत संहिता’ और ‘भावप्रकाश निघंटु’ में धतूरे का ज़िक्र मिलता है, लेकिन हमेशा इस बात पर ज़ोर दिया गया है कि इसका उपयोग अत्यंत सावधानी और विशेष ‘शोधन’ (purification) प्रक्रिया के बाद ही किया जाना चाहिए।
आयुर्वेद के अनुसार, धतूरे में कड़वा (तिक्त) और कसैला (कटु) रस होता है, और यह उष्ण वीर्य (गर्म प्रकृति) का होता है। इसमें ‘गुरु’ (भारी), ‘रूक्ष’ (सूखा) और ‘तीक्ष्ण’ (तेज़) गुण पाए जाते हैं। इसके इतने प्रबल गुणों के कारण ही इसका उपयोग बहुत कम मात्रा में और सिर्फ विशेषज्ञ वैद्य की देखरेख में किया जाता है। यह मुख्य रूप से वात और कफ दोषों को शांत करने में मदद करता है, लेकिन पित्त को बढ़ा सकता है।
धतूरे का सबसे महत्वपूर्ण पहलू इसका ‘शोधन’ है। बिना शोधन किए धतूरे का सेवन अत्यंत हानिकारक और जानलेवा हो सकता है। शोधन की प्रक्रिया में धतूरे के बीज या पत्तों को विभिन्न द्रव्यों (जैसे गोमूत्र, चूने का पानी, दूध) में भिगोकर, उबालकर या पीसकर उसकी विषाक्तता को कम किया जाता है और उसके औषधीय गुणों को बढ़ाया जाता है। यह एक जटिल प्रक्रिया है जिसे सिर्फ अनुभवी आयुर्वेदिक चिकित्सक ही सही ढंग से कर सकते हैं।
इसलिए, जब हम ‘धतूरा (आयुर्वेदिक उत्पाद)’ की बात करते हैं, तो हमारा मतलब उस शुद्ध, संशोधित और मानकीकृत आयुर्वेदिक औषधि से होता है जिसमें धतूरे का उपयोग एक घटक के रूप में किया गया हो, न कि कच्चे धतूरे के पौधे से। यह समझना बहुत ज़रूरी है कि यह कोई सामान्य जड़ी-बूटी नहीं है जिसे आप अपनी मर्ज़ी से कभी भी इस्तेमाल कर लें।
Datura में मौजूद मुख्य जड़ी-बूटियाँ और उनके गुण
जैसा कि मैंने बताया, धतूरा अपने आप में एक शक्तिशाली पौधा है। जब हम किसी आयुर्वेदिक उत्पाद में धतूरे का ज़िक्र करते हैं, तो इसका मतलब होता है कि धतूरे के शुद्ध (संशोधित) रूप को एक या अधिक अन्य जड़ी-बूटियों के साथ मिलाकर एक विशिष्ट फ़ॉर्मूलेशन तैयार किया गया है। चूंकि धतूरा एक ‘विष द्रव्य’ है, इसे अकेले सीधे तौर पर इस्तेमाल नहीं किया जाता। इसे अक्सर ऐसी जड़ी-बूटियों के साथ मिलाया जाता है जो इसके तीक्ष्ण प्रभाव को संतुलित कर सकें या इसके विशिष्ट औषधीय प्रभाव को बढ़ा सकें।
आइए, हम धतूरा पौधे के उन मुख्य गुणों और घटकों को समझते हैं जो इसे आयुर्वेदिक उत्पादों में महत्वपूर्ण बनाते हैं (हमेशा याद रखें, यह शुद्ध और संशोधित रूप में ही होता है):
धतूरा (Datura metel/stramonium): इसमें मुख्य रूप से एल्कलॉइड्स जैसे हायोसायमीन (Hyoscyamine), स्कोपोलामिन (Scopolamine) और एट्रोपीन (Atropine) पाए जाते हैं। यही एल्कलॉइड्स इसे इसके औषधीय और विषाक्त दोनों गुण प्रदान करते हैं।
- दर्द निवारक (Analgesic) गुण: संशोधित धतूरे का उपयोग पारंपरिक रूप से बाहरी तौर पर दर्द और सूजन को कम करने के लिए किया जाता रहा है, जैसे गठिया या मांसपेशियों में ऐंठन।
- श्वसन संबंधी समस्याओं में: इसके एंटी-स्पास्मोडिक (antispasmodic) गुण श्वसन मार्ग की मांसपेशियों को आराम देने में मदद करते हैं। यही कारण है कि आयुर्वेद में इसे बहुत ही कम मात्रा में अस्थमा और खांसी जैसी समस्याओं के लिए उपयोग किया जाता रहा है।
- शांत करने वाला (Sedative) गुण: एल्कलॉइड्स केंद्रीय तंत्रिका तंत्र पर काम करते हैं, जिससे शरीर को आराम मिलता है। हालांकि, इसकी मात्रा में ज़रा सी भी चूक बहुत खतरनाक हो सकती है।
- सूजनरोधी (Anti-inflammatory) गुण: कुछ अध्ययनों से पता चलता है कि इसमें सूजन कम करने वाले गुण हो सकते हैं, जो इसे विभिन्न दर्द निवारक तेलों और लेपों का एक घटक बनाते हैं।
इसके अलावा, आयुर्वेदिक फ़ॉर्मूलेशन में धतूरे के साथ अक्सर अन्य जड़ी-बूटियाँ भी मिलाई जाती हैं। उदाहरण के लिए:
- अदरक (Shunthi): यह पाचन को सुधारने वाला, सूजनरोधी और खांसी व जुकाम में लाभकारी होता है। यह धतूरे के तीक्ष्णता को कुछ हद तक संतुलित कर सकता है।
- लहसुन (Lasuna): इसमें एंटी-बैक्टीरियल और सूजनरोधी गुण होते हैं।
- तिल का तेल (Tila Taila): यह अक्सर धतूरे से बने बाहरी अनुप्रयोगों (जैसे तेल या मलहम) का आधार होता है। तिल का तेल अपने आप में वातशामक और त्वचा के लिए पौष्टिक होता है।
- निर्गुण्डी (Nirgundi): यह भी एक प्रसिद्ध दर्द निवारक और सूजनरोधी जड़ी-बूटी है, जो धतूरे के प्रभाव को बढ़ा सकती है, खासकर मांसपेशियों और जोड़ों के दर्द में।
यह ध्यान रखना ज़रूरी है कि किसी भी आयुर्वेदिक उत्पाद में, इन जड़ी-बूटियों का अनुपात और प्रसंस्करण विधि बहुत मायने रखती है। एक अच्छे आयुर्वेदिक उत्पाद में सभी घटक पूरी तरह से संतुलित होते हैं ताकि वे अधिकतम लाभ प्रदान कर सकें और किसी भी संभावित दुष्प्रभाव को कम कर सकें। इसलिए, हमेशा प्रतिष्ठित ब्रांड्स के उत्पादों पर ही भरोसा करें।
Datura के संभावित फायदे
धतूरा, जैसा कि मैंने बार-बार ज़ोर दिया है, एक शक्तिशाली और सावधानी से उपयोग की जाने वाली औषधि है। इसके औषधीय गुणों का उपयोग आयुर्वेद में सदियों से किया जाता रहा है, लेकिन हमेशा विशेषज्ञ वैद्य की देखरेख में और बहुत ही कम, शुद्ध मात्रा में। यहाँ हम इसके पारंपरिक अनुभवों और सामान्य जानकारी के आधार पर कुछ संभावित लाभों पर चर्चा करेंगे, लेकिन मैं फिर दोहराना चाहूँगा कि ये लाभ केवल संशोधित और विशेषज्ञ द्वारा निर्देशित उपयोग पर ही लागू होते हैं, और कोई भी चमत्कारी या तुरंत असर का दावा नहीं किया जा सकता।
आयुर्वेद में धतूरे का उपयोग मुख्य रूप से निम्नलिखित स्थितियों में किया जाता है:
- श्वसन संबंधी समस्याएं (Respiratory Issues): पारंपरिक रूप से, धतूरे का उपयोग अस्थमा (दमा) और ब्रोंकाइटिस जैसी श्वसन समस्याओं में सहायक के रूप में किया जाता रहा है। इसके एंटी-स्पास्मोडिक गुण श्वसन मार्ग की चिकनी मांसपेशियों को आराम देने में मदद कर सकते हैं, जिससे सांस लेने में आसानी होती है। यह अक्सर धूम्रपान या विशिष्ट आयुर्वेदिक योगों के रूप में (अत्यंत नियंत्रित मात्रा में) इस्तेमाल होता था। लेकिन यह आज की तारीख में बहुत कम उपयोग किया जाता है और इसकी जगह अधिक सुरक्षित विकल्प मौजूद हैं।
- दर्द निवारण (Pain Relief): धतूरे के पत्तों या बीजों से बने तेल या लेप का बाहरी अनुप्रयोग पारंपरिक रूप से जोड़ों के दर्द, मांसपेशियों में ऐंठन, गठिया और तंत्रिका संबंधी दर्द में आराम देने के लिए किया जाता रहा है। इसके एनाल्जेसिक और सूजन-रोधी गुण दर्द और सूजन को कम करने में सहायक हो सकते हैं। यह आज भी कुछ आयुर्वेदिक दर्द निवारक तेलों में एक घटक के रूप में पाया जाता है।
- सूजन कम करने में (Anti-inflammatory): कुछ आयुर्वेदिक ग्रंथों में धतूरे को सूजन कम करने वाला बताया गया है। बाहरी अनुप्रयोगों में यह स्थानीय सूजन को कम करने में मदद कर सकता है।
- तंत्रिका संबंधी विकार (Neurological Disorders): कुछ पारंपरिक आयुर्वेदिक योगों में, बहुत ही कम मात्रा में, धतूरे का उपयोग तंत्रिका संबंधी विकारों जैसे कंपकंपी (tremors) या कुछ प्रकार के दौरे (seizures) को नियंत्रित करने में किया जाता था। हालांकि, यह बहुत ही विशिष्ट और दुर्लभ उपयोग है और आधुनिक संदर्भ में इसकी सिफारिश नहीं की जाती।
- त्वचा संबंधी समस्याएं (Skin Conditions): कुछ त्वचा रोगों जैसे कि दाद (ringworm) या खुजली में, धतूरे के पत्तों का लेप (अत्यधिक सावधानी और विशेषज्ञ सलाह के साथ) बाहरी रूप से लगाने का पारंपरिक उल्लेख मिलता है, क्योंकि इसमें एंटी-फंगल या एंटी-बैक्टीरियल गुण हो सकते हैं।
यह समझना बहुत ज़रूरी है कि धतूरे के ये सभी संभावित लाभ इसकी उच्च विषाक्तता के कारण आधुनिक चिकित्सा में सीधे तौर पर स्वीकार्य नहीं हैं, जब तक कि इसे कठोर वैज्ञानिक परीक्षणों और मानकीकृत प्रक्रियाओं के तहत सुरक्षित और प्रभावी साबित न किया जाए। आयुर्वेदिक उत्पादों में जब धतूरे का उपयोग किया जाता है, तो वह एक जटिल मिश्रण का हिस्सा होता है, और उसके प्रभाव को अन्य जड़ी-बूटियों द्वारा संतुलित और निर्देशित किया जाता है।
मैं आपको सलाह देता हूँ कि इन जानकारियों को केवल ज्ञान के लिए समझें और किसी भी स्वास्थ्य समस्या के लिए हमेशा एक योग्य आयुर्वेदिक चिकित्सक से परामर्श करें। स्व-चिकित्सा, विशेष रूप से धतूरे जैसे शक्तिशाली पदार्थों के साथ, अत्यंत खतरनाक हो सकती है।
Datura का उपयोग कैसे करें
धतूरा एक शक्तिशाली औषधि है और इसका उपयोग हमेशा एक योग्य और अनुभवी आयुर्वेदिक चिकित्सक की देखरेख में ही किया जाना चाहिए। यह कोई ऐसी जड़ी-बूटी नहीं है जिसे आप अपनी मर्ज़ी से, घर पर बिना किसी जानकारी के इस्तेमाल कर सकें। इसकी विषाक्तता के कारण, गलत मात्रा या अनुचित सेवन गंभीर दुष्प्रभाव पैदा कर सकता है।
यहाँ मैं आपको सामान्य जानकारी दे रहा हूँ कि आयुर्वेदिक चिकित्सक आमतौर पर संशोधित धतूरे का उपयोग किस तरह के योगों में और किस रूप में करवाते हैं। यह जानकारी सिर्फ आपके ज्ञानवर्धन के लिए है, इसे कभी भी स्व-चिकित्सा के लिए इस्तेमाल न करें।
सेवन का प्रकार और मात्रा:
- आंतरिक उपयोग (Internal Use): संशोधित धतूरे का आंतरिक उपयोग बहुत ही कम और विशिष्ट आयुर्वेदिक योगों में किया जाता है। इसकी मात्रा इतनी सूक्ष्म होती है कि उसे “मिलीग्राम” में नहीं, बल्कि कभी-कभी “माइक्रोग्राम” में मापा जाता है। यह आमतौर पर ‘वटी’ (गोलियाँ), ‘चूर्ण’ (पाउडर) या ‘अरिष्ट’ (फर्मेन्टेड लिक्विड) के एक घटक के रूप में होता है। इसकी मात्रा हर व्यक्ति की प्रकृति (प्रकृति), दोष संतुलन, बीमारी की गंभीरता और अन्य दवाओं के साथ निर्भर करती है। आंतरिक उपयोग केवल चिकित्सक के सख्त निर्देश और लगातार निगरानी में ही संभव है।
- बाहरी उपयोग (External Use): धतूरे का बाहरी उपयोग अपेक्षाकृत अधिक सामान्य है और कुछ आयुर्वेदिक तेलों, मलहमों या लेपों में इसका उपयोग किया जाता है। यह अक्सर दर्द निवारण, सूजन कम करने या कुछ त्वचा संबंधी समस्याओं के लिए होता है। ऐसे उत्पादों में धतूरे का अर्क या संशोधित घटक अन्य तेलों या जड़ी-बूटियों के साथ मिलाया जाता है।
सेवन का समय:
आंतरिक उपयोग के लिए, चिकित्सक भोजन के साथ या भोजन के बाद, या विशिष्ट समय पर इसे लेने की सलाह दे सकते हैं, ताकि यह शरीर में ठीक से अवशोषित हो और दुष्प्रभाव कम हों। बाहरी अनुप्रयोगों के लिए, इसे दिन में एक या दो बार प्रभावित क्षेत्र पर मालिश करने की सलाह दी जा सकती है।
किसके साथ लेना बेहतर रहता है:
आंतरिक रूप से, धतूरे युक्त योगों को अक्सर शहद, दूध या विशिष्ट ‘अनुपान’ (सहयोगी पदार्थ) के साथ लेने की सलाह दी जाती है ताकि इसके गुणों को बढ़ाया जा सके और तीक्ष्णता को संतुलित किया जा सके। यह सब चिकित्सक के विवेक पर निर्भर करता है।
एक बात हमेशा याद रखें:
आयुर्वेद व्यक्तिगत उपचार पर ज़ोर देता है। हर व्यक्ति की शारीरिक बनावट, दोष संतुलन और बीमारी की प्रकृति अलग होती है। इसलिए, जो खुराक या विधि एक व्यक्ति के लिए सही हो सकती है, वह दूसरे के लिए हानिकारक हो सकती है। स्वयं से धतूरे का उपयोग करने का प्रयास कभी न करें। अगर आपको लगता है कि धतूरे से संबंधित कोई आयुर्वेदिक उपचार आपके लिए उपयोगी हो सकता है, तो सबसे पहले एक योग्य आयुर्वेदिक चिकित्सक से सलाह लें। वे आपकी स्थिति का आकलन करेंगे, आपकी प्रकृति को समझेंगे और फिर तय करेंगे कि क्या धतूरा आपके लिए उपयुक्त है, और यदि हाँ, तो किस रूप में और कितनी मात्रा में।
सावधानियां और ध्यान रखने योग्य बातें
यह खंड सबसे महत्वपूर्ण है, क्योंकि धतूरा एक शक्तिशाली और संभावित रूप से विषैला पौधा है। जैसा कि मैंने पहले भी बताया, आयुर्वेद में इसे ‘विष द्रव्य’ की श्रेणी में रखा गया है और इसका उपयोग केवल ‘शोधन’ (purification) के बाद ही बहुत कम मात्रा में और विशेष परिस्थितियों में किया जाता है। यहाँ कुछ बहुत ही गंभीर सावधानियाँ और बातें हैं जिन्हें आपको हमेशा ध्यान में रखना चाहिए:
- स्व-चिकित्सा बिल्कुल नहीं: यह सबसे पहली और सबसे ज़रूरी बात है। कभी भी, किसी भी कीमत पर धतूरे का स्व-चिकित्सा के लिए उपयोग न करें। कच्चा धतूरा, उसके पत्ते, फूल या बीज का सेवन अत्यंत विषैला और जानलेवा हो सकता है। आयुर्वेदिक उत्पाद जिनमें धतूरा होता है, वे भी केवल एक योग्य आयुर्वेदिक चिकित्सक की देखरेख और परामर्श के बाद ही उपयोग किए जाने चाहिए।
- गर्भावस्था और स्तनपान (Pregnancy and Breastfeeding): गर्भवती महिलाओं और स्तनपान कराने वाली माताओं के लिए धतूरे का उपयोग सख्त वर्जित है। इसमें मौजूद एल्कलॉइड्स गर्भस्थ शिशु या स्तनपान के ज़रिए शिशु तक पहुँच सकते हैं और गंभीर नुकसान पहुँचा सकते हैं।
- बच्चों और बुजुर्गों के लिए: बच्चों और बहुत बुजुर्ग व्यक्तियों को धतूरे युक्त उत्पादों से दूर रखना चाहिए। उनका शरीर ऐसे शक्तिशाली पदार्थों को संभाल नहीं पाता है।
- एलर्जी और संवेदनशीलता: यदि आपको धतूरा या इसमें मौजूद किसी भी घटक से एलर्जी है, तो इसका उपयोग न करें। कुछ लोगों को इसकी हल्की मात्रा से भी तेज़ प्रतिक्रिया हो सकती है।
- अन्य दवाओं के साथ उपयोग (Drug Interactions): धतूरा कुछ आधुनिक दवाओं के साथ प्रतिक्रिया कर सकता है, खासकर वे दवाएं जो केंद्रीय तंत्रिका तंत्र, हृदय गति या रक्तचाप पर असर करती हैं। यदि आप कोई अन्य दवा ले रहे हैं (खासकर एंटी-डिप्रेसेंट, एंटी-हिस्टामिन, हृदय रोग की दवाएं, या कोई भी दवा जो मुंह को सूखा सकती है), तो धतूरा युक्त किसी भी उत्पाद का उपयोग करने से पहले अपने डॉक्टर या आयुर्वेदिक चिकित्सक को ज़रूर बताएं।
-
प्रमुख स्वास्थ्य स्थितियाँ: कुछ स्वास्थ्य स्थितियों वाले व्यक्तियों को धतूरा का उपयोग बिल्कुल नहीं करना चाहिए:
- ग्लूकोमा (Glaucoma): धतूरा आंखों के दबाव को बढ़ा सकता है, जो ग्लूकोमा के रोगियों के लिए बेहद खतरनाक है।
- हृदय रोग (Heart Disease): यह हृदय गति को प्रभावित कर सकता है। हृदय रोगियों को इसका उपयोग नहीं करना चाहिए।
- उच्च रक्तचाप (High Blood Pressure): रक्तचाप को प्रभावित कर सकता है।
- मूत्र प्रतिधारण (Urinary Retention): मूत्र संबंधी समस्याओं को बढ़ा सकता है।
- यकृत और गुर्दे की समस्याएं (Liver and Kidney Issues): शरीर से विषाक्त पदार्थों को निकालने वाले इन अंगों पर अतिरिक्त भार डाल सकता है।
- प्रोस्टेट वृद्धि (Prostate Enlargement): लक्षणों को बढ़ा सकता है।
- आंतों की समस्याएं: आंतों की गतिशीलता को प्रभावित कर सकता है।
-
दुष्प्रभाव और ज़हर के लक्षण: धतूरे के अत्यधिक या अनुचित सेवन से गंभीर दुष्प्रभाव हो सकते हैं, जिनमें शामिल हैं:
- मुंह सूखना, प्यास लगना
- आँखों की पुतलियों का फैलना, धुंधला दिखना
- तेज़ हृदय गति
- बुखार
- मतिभ्रम, भ्रम, बेचैनी
- चक्कर आना, नींद न आना
- बोलने में दिक्कत
- पेशाब करने में कठिनाई
- गंभीर मामलों में कोमा और मृत्यु भी हो सकती है।
यदि आप या आपके आसपास कोई व्यक्ति धतूरे का सेवन कर लेता है और ऐसे लक्षण दिखाई देते हैं, तो तत्काल चिकित्सीय सहायता लें या ज़हर नियंत्रण केंद्र से संपर्क करें।